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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

परिचय एक महापुरुष का

परिचय एक महापुरुष का

मित्रो, आज मैं आपका परिचय उस महान व्यक्ति से कराना चाहता हूँ जिसका जीवन इस धरती पर निवास करने वाले हरेक प्राणी के लिये एक आदर्श है।

इस धरती के इतिहास में बहुत बड़े-बड़े महापुरुष पैदा हुए, वे जिस समाज में भी हों उनका कार्यक्षेत्र उस समाज, समय और स्थान तक ही सीमित रहा और उसी में उनका प्रभाव रहा।

लेकिन जिस महापुरुष का परिचय मैं कराने जा रहा हूँ, वह पूरे संसार के मनुष्यों के लिये हर समय और जीवन के हर क्षेत्र में आदर्श हैं। ये कोई मेरा अपना कथन नहीं है बल्कि उनके बाद आने वाले बहुत से महापुरुषों ने उनकी तारीफ़ की है, बहुत से लेखकों ने उनके जीवन पर किताबें लिखी हैं। आज इस दुनिया में बसने वाले करोड़ों इन्सान उन्हें अपने प्राणों से भी ज़्यादा चाहते हैं।

अच्छा भाईयों अब मैं उनके जीवन की कुछ मज़ेदार झलकियां आपके सम्मुख रखता हूँ।

1) एक बार एक व्यक्ति ने आपसे एक ऊँट मांगा, आपने कहा “मैं तुमको ऊँटनी का बच्चा दूँगा”। फिर उस व्यक्ति ने कहा “मैं ऊँटनी का बच्चा लेकर क्या करूँगा मुझे तो उसपर बोझ लादना है”। इसपर आपने फ़रमाया “ऊँट भी तो ऊँटनी का बच्चा होता है”।

2) एक दिन एक औरत आपके पास आई। आपने उससे कहा “जल्दी घर जा और देख! तेरे पति की आँखों में सफ़ेदी है”।

ये सुनकर वह औरत दौड़ी-दौड़ी घर गई और अपने पति की आँखें देखने लगी । पति ने कहा क्या देखती हो?

औरत ने बताया कि आप (सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम) ने ऐसा कहा है। पति सुनकर मुस्करा दिया और बोला उन्होंने सच कहा है “देखो मेरी आँखों में स्याही के आसपास सफ़ेदी है कि नहीं”।

अब वह भोली औरत समझी और बहुत ख़ुश हुई। वह इस मज़ेदार बात को बड़े गर्व के साथ दूसरों को सुनाया करती थीं।

भाईयो आप समझे ये महापुरुष कौन हैं। ये और कोई नहीं बल्कि अल्लाह के आख़री दूत और इस्लाम धर्म के प्रचारक नबी करीम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम) थे। जिनके ऊपर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी। वो ज़िम्मेदारी क्या थी? वो ज़िम्मेदारी ये थी कि:-

1) इन्सान को इन्सान की ग़ुलामी से निकालकर सिर्फ़ एक अल्लाह की ग़ुलामी में लगाएं जिसने पूरे ब्रह्माँड और संसार की हर वस्तु और प्राणी को बनाया है, और वही उपासना का अधिकार रखता है।

2) संसार में फैली हुई बुराइयों को दूर करके एक आदर्श समाज की स्थापना करना।

3) नारी को उसकी अपमानित और घृणित स्थिति से निकालकर (जो उस समय औरत की थी) समाज में उसको सम्मानित स्थान दिलाना।

4) न्याय क़ायम करना और अन्याय को ख़त्म करने के लिये संघर्ष करना।

तो फिर भाईयो देखा आपने! कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी थी उनके ऊपर, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने आसपास के माहौल को कभी बोझिल और तनावपूर्ण नहीं होने दिया। वो जिस महफ़िल में भी होते लोग मज़े से और बहुत ध्यान से उनकी बातें सुनते। घर में आते तो एक ठंडी हवा के झोंके की तरह सब ख़ुश हो जाते।

भाईयों उनके जीवन की और बातें मैं फिर अगले अंक में लिखूंगा, इन्शाअल्लाह। आपके विचार इस लेख के बारे में ज़रूर लिखिएगा।