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रविवार, 13 दिसंबर 2009

नन्हें की फरियाद

मैं दस महीने का बच्चा हूँ मेरी बहुत सी ख्वाहिशें हैं जिन्हे मैं पूरा करना चाहता हूँ जब भी मैं चीख-चीख कर उन का इज़हार करना चाहता हूँ तो मम्मी पापा मेरी बात सुनने के बजाये जल्दी से मेरे मुहं में दूध की बोतल लगा देते हैं उन का ख्याल है कि सिवाए खुराक के मेरी कोई ज़रुरत नहीं है मुझे सबसे ज्यादा परेशानी अपनी मम्मी से होती है के वो हर वक़्त नयी-नयी चीज़े खिलाने की कोशिश करती रहती है जो मैं हरगिज़ नहीं खाना चाहता. जेसे ही उन्हें पता चलता है की बाज़ार में बच्चो के लिए खाने की कोई चीज़ आई है तो फ़ौरन जाकर ले आती है और फिर मरी शामत आ जाती है. उन का ख्याल है की मरी सेहत अच्छी नहीं है लिहाज़ा मुझे हर दो घंटे बाद ज़रूर कुछ खाने को मिलना चाहिए उसके बाद मेरी नानू है जो मुझे खिलाने पिलाने में माँ से भी आगे है. उन के घर जा कर मैं और भी परेशान हो जाता हूँ वो मम्मा को दाटती रहती है कि तुम बच्चे को डिब्बो की चीज़े खिलाती हो जिस की वजह से वो मोटा नहीं होता.
इसके लिए खुद पकाया करो फिर वो मेरे लिए खिचड़ी, दलिया, साबूदाना, सूप, और न जाने क्या-क्या चीज़े तैयार करने लग जाती है मैं ये देख कर रोने लगता हूँ और जोर-जोर से कहता हूँ की मुझे ये कुछ भी पसंद नहीं है मैं ये हरगिज़ नहीं खाऊगा मगर मेरी कोई नहीं सुनता मेरे रोने पर नानू ये समझती है की मुझे बहुत भूख लगी है और वो जल्दी-जल्दी मेरा खाना तेयार करने लगती है फिर हमेशा की तरह यही होता है की बावजूद मेरे सख्त एहतिजाज के वो मुझे कुछ खिला पिला कर ही दम लेती है नानू इस पर ही बस नहीं करती बल्कि चलते वक्त मेरे लिए बहुत सी चीज़े मम्मा के साथ भी कर देती है कि घर जाकर ज़रूर खिला देना। मेरा बेटा बहुत कमज़ोर होता जा रहा है मुझे अपने नाना बहुत अच्छे लगते है जो ऐसे मुश्किल वक्त में अक्सर मेरी मदद करते है वो कहते है कि बच्चे को जोर ज़बरदस्ती से कुछ नहीं खिलाना चाहिए. खिलाते वक्त अगर मुझे नाना अब्बू नज़र आ जाए तो में पूरी शिद्दत से गला फाड़ कर रोता हूँ जिस पर वो घबरा कर मुझे नानू से छुड़ा कर पार्क में ले जाते है नानू कहती ही रह जाती है "अभी तो इसने ज़रा सा ही खाया है उसे खाने तो दे". पार्क में जा कर मैं बहुत खुश होता हूँ नाना अब्बू मुझे घास पर बैठा देते है वह बहुत सी बत्तिये है जो मुझे बहुत अच्छी लगती है मेरे जेसे छोटे बच्चे भी वहा आते है मेरे लिए ये वाहिद जगह है जहा जाकर में बहुत सुकून और इत्मीनान महसूस करता हूँ क्यूँकि यहाँ मुझे कोई खिलाने वाला नहीं होता है मुझे मेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ कुछ करने ही नहीं दिया जाता. मैं मम्मा की ड्रेसिंग टेबल पर सजी होई ख़ूबसूरत चीज़ों को हाथ में ले कर देखना चाहता हूँ. एक बार बड़ी कोशिश के बाद पर्फेयुम की शीशी उठाने में कामयाब हुआ ही था की एन वक्त पर मम्मा ने आकर मुझसे वो शीशी छीन ली जिस पर मैं बहुत रोया था. मम्मी समझती है की मैं ये चीज़े तोड़ फोड़ दुगां हालाँकि मेरा हरगिज़ एसा कोई इरादा नहीं होता ड्राइंग रूम में सजे हुए डेकोरेशन पीस देखकर मेरा दिल बहुत ललचाता है कि काश ये चीज़े मुझे खेलने के लिए मिल जाये भला ये भी कोई सजाने की चीज़े है. मैं जब कभी भी उन चीजों की तरफ हाथ बढाता हूँ तो ये ये मेरी पहुच से दूर कर दी जाती है कि जेसे में उन्हें तोड़ डालुगा हालाँकि मैने कई बार सबको ये बताने कोशिश की है कि में सिर्फ उनसे खेल कर वापस रख दूगा मगर मुझ पर कोई एतबार ही नहीं करता. जब कि बच्चे झूठ कभी नहीं बोलते मेरी एक ख्वाहिश है कि मुझे दिल भर कर पानी में खेलने दिया जाये. मम्मा जब मुझे नहलाने के लिए बाथरूम में ले जाती है तो मेरी ख़ुशी की इन्तहा नहीं रहती मगर ये ख़ुशी ज़रा देर में ही ख़त्म हो जाती है. वो मुझे जल्दी से नहला कर ले आती है मै चाहता हूँ कि बाथिंग टब में बैठा कर बहुत देर के लिए छोड़ दिया जाये मगर इस मामले में भी कोई मेरा ख्याल नहीं करता क्युकी नानू कहती है कि मुन्ने को जल्दी से नहला दिया करो ज्यादा देर पानी में रहने से ठंड लगने का खतरा होता है इसी तरह मुझे ठंडा पानी पीने और ठंडी चीज़े खाने भी नहीं दी जाती. अब देखिये कितनी शदीद गर्मी हो रही है सब लोग खुद तो ठंडी बोतले, आइसक्रीम, कुल्फिया और न जाने क्या- क्या खा रहे है मगर मुझे कुछ खाने को नहीं दिया जाता के मुन्ने का गला खराब हो जायेगा. मै उन्हें केसे समझाऊ कि सारा दिन नागवार बातो पर गला फाड़ कर एतिजाज कर के मेरा गला किस कदर मज़बूत हो चुका है. कभी-कभी मेरे नाना अब्बू चुपके से मुझे ज़रा सी आइसक्रीम चटा देते है तो मै बहुत खुश हो जाता हूँ मै उनसे कहता हूँ कि नानू और मम्मा कि मर्ज़ी की चीज़े खिलाने के बजाये मुझे कुल्फिया और आइसक्रीम खिलाये फिर देखे मै केसे पेट भर कर खाता हूँ.
मुझे सलमा बाजी से भी शिकायत है वो रोजाना मेरी मालिश करने आती है सुबह-सुबह उन कि शकल देखकर ही मुझे गुस्सा आ जाता है वो रगड़-रगड़ कर तेल से मालिश करके मेरा बुरा हाल कर देती है नानू का कहना है कि इस तरह बच्चे कि सेहत अच्छी हो जाती है जब भी नानू मेरे घर आती है तो वो सलमा बाजी को जरूर टोकती है क्या हलके-हलके हाथ से सहला रही हो जरा सख्त हाथ से मालिश करो इस बात पर मेरी जान ही निकल जाती है क्योकि फिर सलमा बाजी मुझे बहुत सख्ती से रगड़ना शुरू कर देती है वो मुझे इतना जकड़ लेती है मेरे लिए कोई राह फरार बाकी नहीं रहती ऐसे वक्त पर नाना अब्बू भी मेरी मदद को नहीं आते जिस का मुझे बहुत दुःख होता है इसका मतलब है कि वो भी नानू के ख्याल से इत्तफाक करते है,कभी-कभी तो मुझे गुमान होता है के शायद सब लोग मिल कर मुझे पहलवान बनाना चाहते है जब के मै हर रोज़ चीख-चीख कर ये एलान करता हूँ के मेरी फिकर करना छोड़ दे मै बिलकुल सेहतमंद हूँ. काश मेरी जिंदगी से ये नागवारियाँ दूर हो जाये और सारे काम मेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ होने लगे तो कितना अच्छा हो.

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

परिचय एक महापुरुष का

प्रिय मित्रों, काफ़ी समय के बाद, मैं ब्लॉग लिख रहा हूँ। बस बच्चों की बीमारी और काम की व्यस्तता के कारण समय न मिल सका। पिछली बार मैंने "एक महापुरुष का परिचय" नाम से अपना लेख संपादित किया था जिसमें मैंने पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) के जीवन के कुछ उदाहरण दिये थे। साथियों आज मैं उनके द्वारा दी गई कुछ आम शिक्षाओं को प्रस्तुत कर रहा हूँ।

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने अपने साथियों के चरित्र और नैतिकता के निर्माण के लिये तथा जीवन की सारी गतिविधियों को सद्धगुण से सुशोभित करने के लिये प्रथम तो स्वयं अपने चरित्र व व्यवहार को आदर्श स्वरूप पेश किया (इसे परिभाषा में “सुन्नत” कहा गया है) और शिक्षा दी कि तुम लोग इसी का अनुसरण करो, और यही सुन्नत व नमूना रहती दुनिया तक के लिये सारे इंसानों (मुसलमानों) के लिये अनुकर्णीय अनिवार्य आदर्श करार दिया गया। इसके साथ ही, एक तरफ तो क़ुर्आन की शिक्षाओं को खोल खोलकर लोगों को बताया, दूसरी तरफ स्वयं अपनी ओर से भी, जीवन भर अपने अनुयायियों को शिक्षाएं देते रहे। उनमें से कुछ आम शिक्षाएं यहाँ प्रस्तुत हैः
1) तुममें सबसे अच्छा वह है अख़लाक़ (दूसरों के प्रति व्यवहार) सबसे अच्छे हों।
2) अपनी औरतों के साथ अच्छे से अच्छा सुलूक करो। वो आबगीनों (पानी के बुलबुलों) की तरह नाज़ुक होती हैं।
3) तुममें सबसे अच्छा वह है जो अपने से छोटों से प्रेम और बड़ों के साथ आदर के साथ पेश आए।
4) किसी व्यक्ति को दान दो तो दिखावा मत करो, इतनी ख़ामोशी से दो कि दायां हाथ दे तो बाएं हाथ को पता न चले। किसी बड़े सामाजिक, सामूहिक हित के अवसर पर दान दो तो खुले, एलानिया दो ताकि दूसरों को भी प्रेरणा मिले।
५) वह सच्चा इमान वाला (मुस्लिम) नहीं है जिसके पड़ोस में कोई व्यक्ति/परिवार निर्धनता-वश भूखा रहे और वह पेट भर खाना खाकर सोए.
६) मजदूर की मजदूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो.
७) परलोक जीवन (में सफलता) की तैयारी इसी जीवन में कर लो.
८) बुढ़ापा आने से पहले जवानी को गनीमत जानो, बीमारी आने से पहले स्वास्थ को गनीमत जानो, गरीबी आने से पहले धन-सम्पन्नता को गनीमत जानो, मौत आने से पहले ज़िन्दगी को गनीमत जानो (अर्थात इन सब का अधिकाधिक उपयोग सत्कर्म, इशोपसना, इशाग्यपालन में कर लो).
९) तुम में से हर कोई दूसरों के लिए वही पसंद करे जो स्वयं अपने लिए पसंद करता है.
१०) रास्ते से कष्टदायक चीजें (जैसे पत्थर कांटा आदि) हटा दिया करो, ये इबादत है.
११) जिसका वस्त्र हराम, नाजायज़ मॉल (जैसे चोरी, डकैती, ब्याज,रिश्वत, गबन, जुआ, शराब के कारोबार, धोकाधड़ी, जमाखोरी, कम नाप तौल, अवैध व्यापार, अवैध वस्तुओं की बिक्री, झूठ फरेब आदि) से बना हो और जिसका शरीर ऐसे माल से पल रहा हो, उसकी दुआएं अल्लाह हरगिज़ क़ुबूल नहीं करता.

मित्रो: ये थी प्यारे नबी मोहम्मद (सल्ल.) की कुछ आम शिक्षाएँ जिन्हें वो संसार के हर मनुष्य तक पहुचाना चाहते थे. उनकी ये तड़प थी कि इस संसार में शांती स्थापित हो और मनुष्य मनुष्य की गुलामी से निकल कर सिर्फ उस एक पालनहार, कर्ता और रचयिता की गुलामी में लग जाये जो कि इस पूरी श्रष्टि का मालिक है और वही उपासना के लायक है. उनकी ये तड़प उनके जीवन की आखिरी साँस तक रही.
अपनी अंतिम सासों में भी वो अपने अनुयायिओं के लिए प्रार्थना करते रहे और उन्हें संसार में शांति सन्देश फैलाने और शांति स्थापित करने के लिए कहते रहे.
साथियों आज बस इतना ही अगर ऊपर वाले ने चाहा तो अगले अंक में मैं इस महापुरुष के जीवन की कुछ और झलकियाँ प्रस्तुत करूंगा

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

परिचय एक महापुरुष का

परिचय एक महापुरुष का

मित्रो, आज मैं आपका परिचय उस महान व्यक्ति से कराना चाहता हूँ जिसका जीवन इस धरती पर निवास करने वाले हरेक प्राणी के लिये एक आदर्श है।

इस धरती के इतिहास में बहुत बड़े-बड़े महापुरुष पैदा हुए, वे जिस समाज में भी हों उनका कार्यक्षेत्र उस समाज, समय और स्थान तक ही सीमित रहा और उसी में उनका प्रभाव रहा।

लेकिन जिस महापुरुष का परिचय मैं कराने जा रहा हूँ, वह पूरे संसार के मनुष्यों के लिये हर समय और जीवन के हर क्षेत्र में आदर्श हैं। ये कोई मेरा अपना कथन नहीं है बल्कि उनके बाद आने वाले बहुत से महापुरुषों ने उनकी तारीफ़ की है, बहुत से लेखकों ने उनके जीवन पर किताबें लिखी हैं। आज इस दुनिया में बसने वाले करोड़ों इन्सान उन्हें अपने प्राणों से भी ज़्यादा चाहते हैं।

अच्छा भाईयों अब मैं उनके जीवन की कुछ मज़ेदार झलकियां आपके सम्मुख रखता हूँ।

1) एक बार एक व्यक्ति ने आपसे एक ऊँट मांगा, आपने कहा “मैं तुमको ऊँटनी का बच्चा दूँगा”। फिर उस व्यक्ति ने कहा “मैं ऊँटनी का बच्चा लेकर क्या करूँगा मुझे तो उसपर बोझ लादना है”। इसपर आपने फ़रमाया “ऊँट भी तो ऊँटनी का बच्चा होता है”।

2) एक दिन एक औरत आपके पास आई। आपने उससे कहा “जल्दी घर जा और देख! तेरे पति की आँखों में सफ़ेदी है”।

ये सुनकर वह औरत दौड़ी-दौड़ी घर गई और अपने पति की आँखें देखने लगी । पति ने कहा क्या देखती हो?

औरत ने बताया कि आप (सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम) ने ऐसा कहा है। पति सुनकर मुस्करा दिया और बोला उन्होंने सच कहा है “देखो मेरी आँखों में स्याही के आसपास सफ़ेदी है कि नहीं”।

अब वह भोली औरत समझी और बहुत ख़ुश हुई। वह इस मज़ेदार बात को बड़े गर्व के साथ दूसरों को सुनाया करती थीं।

भाईयो आप समझे ये महापुरुष कौन हैं। ये और कोई नहीं बल्कि अल्लाह के आख़री दूत और इस्लाम धर्म के प्रचारक नबी करीम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम) थे। जिनके ऊपर एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी। वो ज़िम्मेदारी क्या थी? वो ज़िम्मेदारी ये थी कि:-

1) इन्सान को इन्सान की ग़ुलामी से निकालकर सिर्फ़ एक अल्लाह की ग़ुलामी में लगाएं जिसने पूरे ब्रह्माँड और संसार की हर वस्तु और प्राणी को बनाया है, और वही उपासना का अधिकार रखता है।

2) संसार में फैली हुई बुराइयों को दूर करके एक आदर्श समाज की स्थापना करना।

3) नारी को उसकी अपमानित और घृणित स्थिति से निकालकर (जो उस समय औरत की थी) समाज में उसको सम्मानित स्थान दिलाना।

4) न्याय क़ायम करना और अन्याय को ख़त्म करने के लिये संघर्ष करना।

तो फिर भाईयो देखा आपने! कितनी बड़ी ज़िम्मेदारी थी उनके ऊपर, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने आसपास के माहौल को कभी बोझिल और तनावपूर्ण नहीं होने दिया। वो जिस महफ़िल में भी होते लोग मज़े से और बहुत ध्यान से उनकी बातें सुनते। घर में आते तो एक ठंडी हवा के झोंके की तरह सब ख़ुश हो जाते।

भाईयों उनके जीवन की और बातें मैं फिर अगले अंक में लिखूंगा, इन्शाअल्लाह। आपके विचार इस लेख के बारे में ज़रूर लिखिएगा।

रविवार, 27 सितंबर 2009

शान्ति कैसे स्थापित हो सकती है ?

यदि सब लोग एक ईश्वर के नियमानुसार जीवन बिताना शुरू कर दें तो स्वयं पूरे समाज में शान्ति स्थापित हो सकती है।
आज विभिन्न धर्मों का धरती पर पाया जाना और हर धर्म के मानने वालों का स्वयं को उत्तम सिद्ध करना ही समाज, देश और समुदाय के लिए हानीकारक साबित हो रहा है। अगर लोगों ने अपने ईश्वर के बताए हुए नियम को अपनाया होता तो सम्पूर्ण संसार एक कुटुम्ब के समान हो सकता था। ईश्वर ने ही मानव को तुच्छ वीर्य से पैदा किया, धरती पर बसाया, बुद्धि ज्ञान दिया,हर प्रकार का उस पर उपकार किया, तो क्या आप समझते हैं कि उसने अपने उद्देश्य से मानव को अवगत न किया ? जिस प्रकार एक कम्पनी कोई सामान बनाती है तो उसके प्रयोग करने का नियम भी बताती है उसी प्रकार ईश्वर ने मानव को पैदा किया तो जीवन बिताने का उन्हें एक जीवन व्यवस्था भी दिया, जिसे उसने संदेष्टाओं ने (जिनकी संख्या 124000 तक पहुंचती है)हर युग और हर देश में मानव तक यह संदेश पहुंचाया कि तुम्हारा ईश्वर तुम से क्या चाहता है, उन सब का संदेश एक ही था कि एक ईश्वर की पूजा की जाए,धरती को परीक्षास्थल समझा जाए, और सम्पूर्ण मानव से अच्छा व्यवहार किया जाए। सब से अन्त में यही संदेश अन्तिम अवतार (जिनकी आज हिन्दू लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं) के द्वारा ईश्वर ने कुरआन के रूप में सम्पूर्ण संसार के लिए उतारा। जिसका सम्बोधन प्रत्येक मानव जाति से है। बस आवश्यकता है कि आप इस्लाम का अध्ययन कर के देखें। आप पाएंगे कि यह मुसलमानों की सम्पत्ति नहीं जैसा कि ताब्दियों से कहा जा रहा है बल्कि यह तो सारे मानव के लिए उसके ईश्वर का उपहार है।